सभी राजनीतिक दलों को आइना दिखाया एक सामान्य विधायक

न्यूज़ डेस्क। बिहार के दरभंगा जिले के हायाघाट विधायक अमरनाथ गामी ने दलगत राजनीती से हटकर अपने फ़ेसबुक वॉल पर कुछ प्रतिक्रिया दिया है,जिसमें उन्होंने सभी राजनीतिक दलों को आईना दिखाया है,विधायक अमरनाथ गामी ने कहा कि “आजादी से पहले राजा राजबारों का शाषन रहा या अंग्रेजों का उस समय भी साशन व्यवस्था थी,वो भी हमसे कर लेकर बेहतर साशन व्यवस्था देने का प्रयास करते होंगे अपने हित के बाद,हो भी क्यों नहीं ..क्योंकि सत्ता व्यक्ति को समर्पित था,उस समय जो विकास कार्य होते थे,100 % बिना लिकेज का, अगर 100 की अर्थब्यवस्था थी तो जितने राशि विभिन्न क्षेत्रो के विकाश के लिये तय किये.जैसे शिक्षा,स्वास्थ,अन्य आधारभुत संरचना,साथ ही रक्षा के साथ अपनी रक्षा का पूरा ख्याल रखते होंगे,सभी क्षेत्रो में बिना लिकेज विकास दिखती थी,उदाहरण के तौर पर उनके समय के स्कूल भवन,रेलवे स्टेशन,न्यालय भवन या राजा राजबारो का किला को देखा जा सकता है,जैसे आज भी लगता है बिलकुल मजबूत एवं भव्य है,उनका साशन व्यवस्था में बना विधानसभा भवन या लोकसभा भवन या राष्ट्रपति भवन, मन मोह लेता है,फिर जब सब कुछ ठीक था तो देश उनके खिलाफ गोलबंद कैसे हुआ होगा,व्यक्ति निष्ठ साशन होने के नाते शाषन प्रणाली भी क्रूर होगी,दंड प्रक्रिया भी करी होगी,फिर शुरु हुई होगी उनकी क्रूरता के खिलाफ लड़ाई,लड़ाई का नेतृत्व कुलीन वर्ग के पढ़े लिखे लोग करते होंगे,समाज उनके नेतृत्व में आंदोलन को मजबूती देते होंगे,उस समय सभी विचारों के नेता गण राष्ट्रवाद से ओतप्रोत होकर अपने-अपने विचारो के हिसाब से विदेशी हुकूमत के विरुद्ध कुर्बानिया दी होगी ,कोई गरम दल कोई नरम दल,कोई हिंसा से कोई अहिंसा से, अपनी आंदोलन को करने लगे,फिर लोग जुटता गया कारवां बनती गयी,आजादी के बाद सभी विचारो के लोग काँग्रेस के नेतृत्व में शासन में आये जनता ने आम चुनाव में पूरा समर्थन दिया,फिर जो हमारी संविधान बनी अंग्रेजो द्वारा निर्मित संविधान में अपने हिसाब से सुधार कर बनाया गया जो सही में अच्छा संविधान कहा जा सकता है,अब उस संविधान में मात्र एक बदलाव किया गया होगा,विधायिका द्वारा निर्मित संविधान को कार्यपालिका संचालित करेगी, फिर यहीँ से ये खेल शुरू हुआ होगा, कार्यपालिका पर नियंत्रण को कोई करा प्रावधान नहीं किया गया ,मतलब उनकी गलतियों को भूल की श्रेणी में रखे होंगे या कुछ बड़ी गलती तो छोटा-मोटा सजा,बड़े ही चतुराई से अपने को विधायिका जवाब देह मुक्त रखा होगा,अगर कोई गरबरी सामने आ भी जाये तो उनके उपर उस गरबरी का छीटें न पड़े,फिर शुरू हुआ होगा लोकतंत्र को लूटतंत्र से बचाने का संघर्ष फिर शुरू हुई,विचारों की राजनीती कोई वामपंथ के लिये कोई दक्षिण पंथ के लिये कोई शोषित-पीड़ित के नाम पर व्यवस्था परिवर्तन की आवाज बुलंद करने लगे,फिर एक समय ऐसा आया निरंकुश सत्ता को उखाड़ने के लिये सभी विचार के लोग एक हो गये,पुराणी अलोक प्रिय सरकार गयी। सयुंक्त सरकार आयी,ये सरकार विभिन्न मतों के होने के कारण समय से पहले घुटने टेक दिये याने सरकार गिर गयी, फिर आम चुनाव में अपने अपने पार्टी विचार के आधार पर जन मानस के बिच गये,पुनः इनके बिखराव का फायदा उन्हें मिला.फिर कॉग्रेस की सरकार बनी,असमय तत्कालीन प्रधानमन्त्री जी की हत्या हुई,फिर प्रचंड बहुमत में उनकी सरकार बनी ।सरकार के प्रधान गैर राजनीतिक व्यक्ति थे, माँ के देहांत के बाद उन्हें उच्च कुर्शी मिली थी,फिर राज्यो के चुनाव में उनका गैर राजनितिक मन जाग गया,अपने भाषणों में कहने लगे हम एक रुपया भेजते है ,तो आपके पास दस पैसा आता है,वो जनता में पॉपुलर होने लगे, राज्यो की चुनाव जीतते गये,अब उनके बातो से प्रभावित होकर उनके ही वित्तमंत्री केन्द्र द्वारा जो मंत्रालय सीधा संचालित होता है,उनकी लिकेज पर से पर्दा हटाया ,बोफोर्स डील में ज्यादा कमीशन का खेल हुआ ये बोल इस्तफा दिए,एक विचारधारा सीधे उन्हें नेता मान उनके पिछे खड़े हो गये, फिर गठबंधन की राजनीत हुई,संयुक्त विपक्ष की सरकार बनी,वो भी सत्ता के केन्द्र कहिये या लूट के हिस्सेदारी में झगड़े के कारण समय से पहले सरकार की बली चढ़ा दिए,काँग्रेस नेता का आतंकी हमला में निधन हो गया,फिर आम चुनाव में कांग्रेस की सरकार बनी,जो पूर्ण बहुमत नहीं पा सकी थी ,उनपर खरीद फरोख्त की सरकार बनाने का आरोप लगा,फिर वो सरकार पुरे पाँच साल कार्यकाल पूरा किया,फिर आम चुनाव में तीसरी मोर्चा की सरकार बनी जो ज्यादा दिन नहीं चली आपसी खींचतान में दो दो प्रधानमंत्री दिये फिर भी कार्यकाल पूरा नहीं कर सके उसके बाद एनडीए की सरकार बनी जो दो बार जनता के आशीर्वाद से अटल जी के नेतृत्व में सरकार बनी जो अपने कार्यो को अच्छा मान छौ महिना पहले चुनाव करा ली फिर आम चुनाव में यूपीए की सरकार बनी ,जो सफलता पूर्वक पाँच साल पूरा किया,फिर आम चुनाव में दोबारा यूपीए की सरकार बनी उस सरकार में कैग की टिपणी पर कोल् घोटाला,2g स्पेक्ट्रम घोटाला,कॉमन वेल्थ घोटाला का जोर शोर से प्रचार हुआ,जिसमे गैर राजनीतिक संगठन भी जोर शोर से हवा दिया,बीजेपी भी उस घोटाले पर जनता के बीच गयी,जनता ने आपार बहुमत भाजपा को दिया,अब इन्होंने अपनी चार साल पूरा कर लिये है,अगले साल आम चुनाव है,जो देखना है जनता किन्हें आशीर्वाद देता है।इसी बिच राजनितिक दलों को विदेशों से मिलने वाला चंदा बिल जिसमे चंदा देने वालों का नाम बताना जरूरी नहीं है,बिना बहस पास हो जाती है।निश्चित रूप से इतना कहानी कहने का मतलब ये है,कैसे विभिन्न विचारधाराओं वाली पार्टी कैसे सत्ता के लिये समय समय पर गला मिलाये क्या मज़बूरी होगी ,आखिर सत्ता में ऐसा है क्या,जो विपरीत विचारों को एक मंच पर लाती है,सभी दल परोक्ष अपरोक्ष रूप से सत्ता का स्वाद चख चुकी है,जितने भी दल है उनका दलिय कोष सत्ता में रहे अवधि अनुसार बढ़ता गया,कॉग्रेस अधिक दिन राज किया,तो कांग्रेस का पार्टी फण्ड अधिक बढ़ा होगा बीजेपी उस से कम राज्य किया तो उनसे कम पार्टी फण्ड होगा,बांकी पिछलगु पार्टी सत्ता दिन या सदस्य शक्ति के अनुसार उनका भी पार्टी फण्ड कुछ न कुछ बढ़ा होगा,केवल पार्टी फण्ड ही नहीं बढ़ा सत्ता काल के हिसाब से पार्टी नेताओं का भी बजूद के हिसाब से निजी फण्ड भी बेतहासा बढ़ा होगा,अब आइये निचोर बात पे हम आम आदमी दो तरह के कर चुकाते है ,एक प्रत्यक्ष कर जो gst या आयकर या अन्य कर के रूप में देते है एक अप्रत्यक्ष कर जो विभिन्न देशी विदेशी उत्पाद जो अपने दिनचर्या में उपयोग करते है,सरकारे उत्पादक कंपनियों को छूट दे रखी है वो जितना मुनाफा रख हमें लूट सके लुटलें, उन उद्योगपतियो को बजट में विशेष सुविधा दे उपकृत करते होंगे, तभी तो वो देश एवं विदेश से राजनितिक दल को कुछ नामी कुछ बेनामी चंदा देते होंगे पूर्व में ये व्यवस्था थी ,कोई भी कंपनी मुनाफे से 7.5% से अधिक चंदा नहीं दे सकता अब जितना चाहे देदे कोई फर्क नहीं पड़ता,जब आम जनता जनता राजनितिक दलों को चंदा नहीं देता तो उनके फण्ड में इतना पैसा आता कहा से होगा,ऐसा सभी लोग सोचते होंगे,अब समझ में आगयी होगी चंदा का फंदा,जब प्रधानमंत्री पद के व्यक्ति राजीव गांधी सौ में दस रुपया खर्च होता है,कहते थे या वर्तमान प्रधानमंत्री जी कहते है काँग्रेस शासित प्रदेशों में भ्रस्टाचार अधिक है तो आप भी मानते होंगे भ्रस्टाचार है,इसका मतलब ये हुआ सभी दल भ्रस्टाचार की तो बात करते है,समाप्त करना कोई नहीं चाहते है,उनका उद्देश्य केवल ये है कैसे सत्ता पाया जाय,ऐसा नहीं है सभी राजनेता ऐसे थे होंगे जिन्होंने विभिन्न विचारों को ले जो संगठन बनाये वो व्यवस्था परिवर्तन चाहते थे,उनके लंबी संघर्ष के बाद सत्ता मिली,वो तो सत्ता नहीं देखे उनके अनुयायी सत्ता पाते ही विचार को पिछे कर दिया स्वार्थ को आगे कर देश को खोखला करने में लग गये, याद रहे आज भी सभी पार्टी के करोड़ो कार्यकर्त्ता विचार के कारण अपनी अपनी पार्टीयों में अपना सर्वस्व न्योछावर कर रहा है ,उनकी एक मात्र कल्पना होती है हमारी सरकार आयेगी, हमारे सपनो को साकार करेगी ,नेता अपने विचार वाला दल को अपने अवैध धन से अपनी पकड़ मजबूत रखने में ज्यादा मस्त देखे जाते है।वो कार्यकर्त्ता मृगतृष्णा में नेता जिंदाबाद करते रह जाते है,सत्ता आती है चली जाती है,पार्टी का विचार किताबो में या कार्यकर्ता के दिलों में दफन रह जाता है वो करभी क्या सकता है अपने नेता के जिंदाबाद के अलावा ,विपक्ष का तो विरोध नियति है।ऐसा नहीं है,सब कुछ पहले जैसा है,राजीव जी का उस समय का कथन सही था होगा,जनदबाब में बहुत सारे सूधार कार्य हुये है,अभी भी बहुत कुछ करना बांकी है,याद रहे जितनी सुधार की बाते हुई है मजबूर हो कर किये होंगे थोड़ा और दवाब बने तो अधिक बदलाव संभव है,पारदर्शी व्यवस्था अधिक जवाब देहि,मतलब अनियमितता पर सख्त सजा,सरकारी कार्यो का अधिक जनदर्शन की व्यस्वस्था करने की दबाब सभी राजनितिक दलों पर बने तो कुछ बदलाव संभब है,एक बात तो आसान है,सभी प्रतिनिधि मुखिया हो या, विधायक, सांसद,मंत्री हो या मुख्यमंत्री,सभी अपना अपने परिवार निकट रिस्तेदार का पहला चुनाव वर्ष के संपत्ति की घोषणा से अबतक के संपत्ति की संपत्ति की घोषणा को वेवसाइट पर डाले जनता तय करलेगी ,हमारे नेता का उस समय कितना संपत्ति था अब कितना है,ऐसा करने से जिनके बारे में जो जानना चाहे आराम से जान सकता है उनकी आमदनी अनुसार कितना गुना संपत्ति बढ़ा है फिर कुछ किया जा सकता है,इन सुधार की बातों से किसी भी राजनितिक दल को जरूरत नहीं है उन्हें तो केवल सत्ता चाहिये, सभी दल अपने काम से ज्यादा जनता को किसी विषय पर उदेलित कर वोट अथियाना,को अचूक हथियार समझते है।गांधी,लोहिया,दीनदयाल या मार्श-लेलिन,जयप्रकाश सभी दर्शन किताबो की बात रह गयी।”

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