केंद्र द्वारा मैथिली भाषा के अपमान पर विवाद, मैथिल संस्थान एकजुट

दिल्ली. लगभग डेढ़ दशक पहले भारतीय संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल प्राचीन मैथिली भाषा को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा मौखिक भाषा (बोलचाल की भाषा) कहा जाना मिथिला क्षेत्र के राजनेता समेत साहित्यसेवियों तथा बुद्धिजीवियों के लिए बहुत ही बड़ा आघात है। सरकारी महकमे से मैथिली भाषा के प्रति इस तरह का बयान यहाँ के लगभग आठ करोड़ जनमानस में रोष पैदा कर दिया है। मैथिली भाषा तथा क्षेत्र के विकास के लिए सदैव तत्पर ‘विश्व मैथिल संघ’ तथा दीपक फाउंडेशन के साथ-साथ दर्जनों मैथिल संस्थान ने सरकार के इस रवैये का पुरजोर विरोध किया है।

विश्व मैथिल संघ के संरक्षक तथा दीपक फाउंडेशन के अध्यक्ष दीपक झा ने इस विषय पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि केंद्रीय मंत्री द्वारा इस तरह की बयानबाजी निंदनीय है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार देश की एक समृद्ध, साहित्य तथा वैज्ञानिक भाषा की उपेक्षा कर रही है, जबकि भाजपा की ही अटल सरकार ने मैथिली भाषा को संविधान के अष्टम सूची में स्थान दिलाया था। उन्होंने कहा कि जावेडकर को इस तरह का बयान देने से पहले एक बार मैथिला भाषा का इतिहास पढ़ लेना चाहिए था। केंद्र ने विद्यापति की भाषा का अपमान किया है, जो हम मैथिल के लिए असहनीय है।

ज्ञात हो कि भाजपा से निलंबित दरभंगा के सांसद कीर्ति आजाद द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के जबाव में केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने कहा है कि मैथिली भाषा सिर्फ मौखिक भाषा है। प्रकाश जावडेकर के इस जवाब पर मिथिला की दर्जनों संस्थाओं ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा है कि यह सरासर मैथिली का अपमान है।

ज्ञात हो कि मैथिली भाषा लिपि भारत की सबसे पुरानी लिपियों में चर्चित रही है। आज भी मिथिला क्षेत्र में इस लिपि का उपयोग किया जाता है। बिहार सरकार द्वारा आयोजित उच्च शिक्षा की परीक्षा में भी इस लिपि से प्रश्न पूछे जाते है। बिहार, झारखण्ड तथा नेपाल में मैथिली भाषा बहुत ही प्रचलित भाषा है। इतना ही नहीं नेपाल में मैथिली भाषा को दूसरी राष्ट्र भाषा का दर्जा भी प्राप्त है।

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