प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में कूड़ा बना रोजी रोटी का जरिया

वाराणसी संवाददाता।
महिलाओं की मेहनत से प्रदेश का पहला स्वच्छ गांव बना वाराणसी का छितौनी कोट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की उत्साही महिलाओं के हौसले से दो गांव न सिर्फ साफ हो गया बल्कि वहां का कूड़ा भी अब उनकी रोजी रोटी का जरिया बन गया है.

गांव को साफ करने की यह पहल मोदी सरकार की एसएलआरएम योजना के तहत हुई है. गांव की इन उत्साही महिलाओं की वजह से उनका गांव प्रदेश का पहला पूर्ण स्वच्छ गांव बन गया है.

चौला ब्लॉक के छितौनी कोट गांव में बने एसएलआरएम सेंटर में बॉक्स में रखी चूड़ियां, बोतल के ढक्कन, टूथ ब्रश, कॉस्मेटिक की डिब्बियां, कांच की बोतलें और टोकरी में सजे घरेलू सामानों को इकट्ठा कर ये महिलाएं आज अपनी रोजी-रोटी चला रही हैं.

कूड़ा इकठ्ठा करने वाली महिला ने बताया कि घर को पास के कूड़ा- कचरा और गन्दगी को हटाकर साफ़ सुथरा रखेंगे तो बच्चे बिमारी से बचेंगे. उन्होंने बताया कि जब इनके गांव में सॉलिड लिक्विड रिसोर्स मैनेजमेंट की योजना आई. बात गांव की सफाई की थी लिहाजा हमारी जैसी 50 महिलायें फौरन इस काम में जुट गईं.

कूड़े से तैयार सामान की फोटो.

कुछ महिलाओं ने कूड़ा गाड़ी चलाने की जिम्मेदारी ली तो कुछ साथ में चल कर घरों से कूड़ा उठाने लगीं. बाकी बची महिलाएं सेंटर पर आये कूड़े को अलग-अलग कर उसे सफाई से रखने की जिम्मेदारी निभाने लगीं और कुछ कम्पोस्ट खाद बनाने में जुट गईं. इसके बाद देखते ही देखते गांव की सूरत बदलने लगी.

समाजिक बंधन से होना पड़ा दो चार

शुरू में इन महिलाओं को गांव के समाजिक बंधन से दो चार होना पड़ा. शांति देवी बताती हैं कि पहले बहुत लोग बुरा मानते थे. कहते थे कि इनके हाथ का पानी नहीं पीएंगे. हम लोग कहा करते थे कि कोई बात नहीं रोजी-रोटी की बात है. साथ ही गांव को साफ रखना है, तो हम ये करेंगे.

इस योजना के तहत इन महिलाओं को रिक्शा ट्रॉली दी गई जिसमें जैविक और अजैविक कूड़े के लिये अलग-अलग खाने बने थे. गांव के घरों में भी हरे और लाल डिब्बे दिए गे. यहां जैविक कूड़े से वर्मी खाद बनाने का चेंबर बना. वहीं अजैविक कूड़े की छंटाई कर उन्हें कबाड़ में बेचकर आमदनी का जरिया बनाया गया.

क्या बोले जिले के सीडीओ

वाराणसी के मुख्य विकास अधिकारी सुनील वर्मा ने न्यूज18 हिंदी से बताया कि हर आइटम चाहे वो जैविक कूड़ा हो, चाहे किचेन वेस्ट हो, चाहे अजैविक, प्लास्टिक बॉटल, ढक्कन या अंडे के छिलके सबको अलग-अलग करना उनको सुखाना और फिर उनको सही प्रॉडक्ट से लिंक करना इन महिलाओं ने सीख लिया है. आज के दौर में ये महिलाएं पूरी तरह से ट्रेंड हो गई हैं.

कैसे होती हैं इन महिलाओं की आमदनी

सीडीओ सुनील वर्मा बताते हैं कि प्लास्टिक, लोहा, कांच और बोतल को बेचकर उनकी अच्छी आमदनी हो जाती है. कुछ महिलाएं कम्पोस्ट खाद बनाकर आमदनी का जरिया बना रही हैं. उन्होंने बताया कि कूड़े के बेहतर निस्तारण के साथ ये महिलायें गांव में गोमूत्र और गोबर से पंचद्रव्य, पेस्टीसाइड और अमृत धारा जैसी ऑर्गेनिक दवाइयां और गाय का घी भी बना रही हैं.

फिलहाल केंद्र सरकार की इस योजना से इन महिलाओं ने जहां एक तरफ गांव को साफ-सुथरा बना दिया है. वहीं रुपये कमाकर घर का खर्च भी चला रही हैं.

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